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Wednesday, December 31, 2025

गुरु मार्गदर्शक है, लक्ष्य नहीं!

कुछ दिन पहले मुंबई गया था, तब सोचा नरीमन पॉइंट जाके देखू दिमाग मे बैठ गया की मुझे नरीमन पॉइंट जाना है। फिर सोचा किसी से मार्गदर्शन ले लू की कैसे जाते है। स्टेशन पर एक बंदा बैठा हुवा था उसको पूछा भाई यहा से नरीमन पॉइंट कैसे जाते है उसने मुझे बोला की स्टेशन से बाहर जो टैक्सी मिलेगी वो कर लो और जाओ नरीमन पॉइंट बोहोत ही सुंदर है वहा से समुद्र का जो दृश्य है वो अत्यंत दुर्लभ है मैंने स्वयं अनुभव किया है। मैं सोचा माँ की आँख ये बंदा तो नरीमन पॉइंट देखके आया है इतना मस्त वर्णन तो नरीमन पॉइंट जाके लौटने वाला ही कोई कर सकता है।

फिर क्या? मैंने उसके पैर पकड़ लिए मुझे जो चाहिए था मिल गया मैं उस बंदे के के पैरों मे बैठकर सेवा करने लग गया। और बोलने लगा "अब बस जो करना है आप ही कर दो मेरेको नरीमन पॉइंट पहुचा दो मेरी नैया पार लगा दो। आप का ही सहारा है।"

अब बताओ मैंने सही किया न? इससे मैं नरीमन पॉइंट पहुच जाऊंगा न वही स्टेशन पर बैठे रहूँगा और उस बंदे के पैर पकड़े रहूँगा जब्तक नरीमन पॉइंट सामने न आ जाए, क्यों की जिसने मेरेको मार्गदर्शन किया है उसने नरीमन पॉइंट देखा है इसका मतलब वो नरीमन पॉइंट को स्टेशन तक भी ला सकता है। देखा मैं कितना स्मार्ट हु....? क्या? नहीं हु? लोग यही तो करते है.. गुरु बनाकर उसके पैरों मे गिर जाते है और बोलते है नैया पार लगा दो गुरुदेव...वो सही है फिर मैं क्यों गलत?

आज एक ऐसी चीज बताऊँगा जो दुनिया मे कोई माई का लाल नहीं बताएगा अगर किसिने बताया हो तो मैं उसको वंदन करूंगा। क्यों की वही बंदा गुरु तत्व को जानता है और आदर्श है जिसको वंदन करने मे मुझे कोई आपत्ति नहीं। बहुत से लोग देखे होंगे जो गुरु इस शब्द के अनेक पुस्तकी व्याख्याये बताते है। और बहुत से गुरु ऐसे है जो गुरुसाधना ही जीवन का अंतिम लक्ष है यही बताते है। अगर ऐसा होता तो दादागुरु मच्छिनदरनाथ को दत्तात्रय भगवान गुरु रूप मे प्राप्त हो गए थे। करते बैठते दत्तउपासना क्यों उनके आदेश से कड़ी तपस्या करके नया पंथ का निर्माण किया? यही तो आजकल के गुरु भक्त समझ नहीं पाते। भ्रम मे जी रहे है हर कोई गुरुतुल्य अवतारों के चरणों मे पड़े रहने को ही धन्यता मान बैठे है जैसे दत्तगुरु, स्वामी समर्थ, समर्थ रामदास स्वामी..इनको गुरु माननेवाले (चाहे वो इनलोगोको शिष्य माने या ना माने कोई बात नहीं) 'इनकी उपासना करने मे जीवन की धन्यता है' ये मान बैठे है। गुरु की उपासना केवल तब की जाती है जब जीवन मे कोई प्रत्यक्ष गुरु तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए न हो, या फिर तुम अगली कठिन परीक्षा देने एवं अगले स्तर पर जाने को सज्ज मानते हो तभी गुरु की उपासना की जाती है ताकि वो आपकी परीक्षा लेकर उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण कर दे।

अगर जीवन मे अभी गुरु नहीं है इसका अर्थ है जीवन बोहोत अच्छे से कट रहा है अभी तुम्हारी उतनी लेवल नहीं हुई की कोई गुरु तुम्हारी परीक्षा ले सके। इसका सीधा मतलब है की तुम उन चूतियों मे गिने जाते हो जो परीक्षा लेने के लायक भी नहीं है। इसलिए जिंदगी जैसी कट रही है काट लो। जिस दिन तुम्हारे जीवन मे गुरु का आगमन होगा उस दिन से तुम्हारी खरी परीक्षा शुरू हो जाएगी। ये वास्तविक सत्य है गुरु का।

जो अध्यात्म मे आगे जाना चाहते है वो ढूंढते है गुरु..क्यों?
क्यों की हम जो भी कर रहे है वो सही कर रहे है या नहीं? हमारे अंदर कोई दोष है या नहीं? अगर हम इस स्तर को पूर्ण कर चुके है तो हमारी परीक्षा लेकर अगले स्तर मे पहुचने के लिए जो व्यक्ति चाहिए वो होता है गुरु..! क्यों की हमारे साधना स्तर का आकलन, परीक्षण वही व्यक्ति कर सकता है जो उस क्षेत्र मे बेस्ट हो।

गुरु प्राप्त होना कोई चॉकलेट नहीं कि हर साल गुरु चरित्र का परायण कर लिया, दो आँसू बहा दिए, दो भजन सुन लिए और सोचा “अब सब ठीक हो जाएगा।” लोग समझ नहीं पाते कि गुरु कोई लाइफ़-कोच नहीं, कोई थेरेपिस्ट नहीं, और न ही कोई भावनात्मक सहारा। गुरु का एक ही काम है। तुम्हें तपाना, तोड़ना, झोंकना, गिराना, और फिर तुम्हें ऐसा मज़बूत बनाना कि तुम खुद खड़े रहो। पर आजकल लोग चाहते क्या हैं? गुरु गोदी में बिठाएँ, दूध पिलाएँ, शाबाशी दें, और जिंदगी की हर गड़बड़ को जादू की छड़ी से ठीक कर दें।

स्कूल–कॉलेज में सबको मान्य है कि पहले पढ़ाई, फिर परीक्षा, फिर अगला लेवल। पर आध्यात्म में आते ही लोग उम्मीद करते हैं “अब तो मेरी मुश्किलें खत्म।” भाई, जब तुम लोग शिव जैसे VC (अध्यात्म और तंत्र के Vice Chancellor) को गुरु बना बैठते हो, दक्षिणामूर्ति जैसे रजिस्ट्रार (supremo of all Faculties) से उम्मीदें लगा लेते हो, दत्तगुरु जैसे Exam Controller से दया की भीख माँगते हो। तो तुम्हारा बैंड नहीं बजेगा तो क्या आरती उतरेगी?

लोग भूल जाते हैं गुरु जीवन सुधारने नहीं आता, बल्कि जीवन को उलट-पुलट कर नया बनाने आता है। सोना आग में तपकर बनता है, गुलाब-जल से नहीं। गुरु अगर मुश्किलें नहीं देगा, तो कच्चा माल कभी शुद्ध कैसे होगा? आध्यात्म और तंत्र कोई नर्सरी क्लास नहीं है; ये तो यूनिवर्सिटी से भी कठिन, और वैदिक परीक्षाओं से भी कठोर क्षेत्र है। अगर गुरु इतने कठोर होते है तो तुम तो सीधा शिव, दक्षिणामुर्ती और दत्तगुरु के पीछे पड़े हो। आध्यात्म हो या तंत्र इसमे जो मार्गदर्शक/गुरु/ आचार्य होते है उनके पास KG की टीचर जैसी मिठास नहीं मिलती, वे सदैव कठोर ही मिलेंगे और उनसे भी अधिक कठोर होते है यहाँके HOD, Registrar, Exam Head और VC जैसे खडूस, बेपरवाह, नियम-प्रधान सत्ता मिलती है। जो केवल योग्यता देखती है, भावनाएँ नहीं, भक्ति दिखाना है तो इष्टको दिखाओ समर्पण दिखाना है तो अपने जीवन का उद्देश है उसे प्राप्त करने के लिए जो मार्ग गुरु ने बताया है उसपर चलकर साबित करो। गुरु को मक्खन लगाने से गुरु और मोह माया मे फसा देगा और ये जनम और एक जनम और एक जनम बस class repeat करते बैठोगे। देखा होगा क्लास के सबसे होनहार विद्यार्थियों को शिक्षक हमेशा नए नए oportunity देता है डांटता है और निखारता है, और मक्खन लगाने वालों को क्लास का मॉनिटर बना देंगे, स्कूल का कोई काम बता देंगे, और लोगों को लगता है वा क्या लाइफ है उस बंदे की वो शिक्षक का सबसे चहीता है। पर ऐसा कुछ नहीं होता शिक्षक के नजर मे उस स्टूडेंट की उपयोगिता केवल दूसरी क्लास से डस्टर और chalk लाने की ही होती है, पास हुवा तो ठीक वरना क्लास रीपीट तो करेगा ही।

गुरु असल में रास्ते में लगा हुआ sign board है। बस दिशा दिखाता है। साइन बोर्ड से जकड़कर लटकने लगोगे, तो मंज़िल कौन दिखाएगा? पर लोग क्या करते हैं? गुरु को पकड़कर बैठ जाते हैं, सोचते हैं “गुरु मिला, अब सब मिल गया।” अरे जब जंगल में रास्ता भटक गए थे तब मुख्य रास्ते तक पहुचना और साइन बोर्ड ढूँढना जरूरी था, पर हाइवे पर पहुच गए साइन बोर्ड मिल जाए तो आगे सूचना पढ़कर चलना और भी जरूरी होता है जबतक अगला sign बोर्ड नया मिले। मगर आजकल के साधक साइन बोर्ड के नीचे तंबू गाड़कर बैठ जाते हैं - गुरु गुरु गुरु गुरु… और फिर शिकायत करते हैं - “गुरु मेरी सुनते नहीं।”

गुरु चरित्र, गुरु कथा, गुरु परायण ये सब तब तक काम है जब तक वास्तविक गुरु प्राप्त न हो। जिस दिन गुरु मिला, उस दिन मन लगाकर अपने इष्ट की ओर चलना चाहिए। गुरु मंज़िल नहीं, गुरु रास्ता भी नहीं वो केवल एक sign board है। पर लोग sign board के बताए रास्ते पर चलने की बजाय उस sign board/milestone को ही पूजा-घर में रखकर आरती उतारने लगते हैं। फिर गुरु क्या करे? जो लोग गुरु से चिपककर बैठे हों, उनसे गुरु क्या आउटपुट निकालेगा? परीक्षा। और परीक्षा। और और भी कड़ी परीक्षा। करते रह तेरी क्लास रीपीट, लेता रह बेटा जनम पे जनम और पड़े रह इसी मोह माया के टट्टी मे। अब कुछ लोग बोलेंगे "अबे ये शिवांश पंगला गया है...मैंने मेरी समस्याओ के लिए पारायण किया था और मेरी समस्याए खतम हो गई, मेरे साथ चमत्कार होते है, ये शिवांश की मत सुनो...." तो ऐसे लोगों को बस ऐसे देखो की दत्तगुरु ने इनकी समस्याए दूर करके इनके हाथ मे झुनझुना पकड़ा दिया है। ये वही so called गुरु के अत्यंत प्रिय विद्यार्थी है जो सालों साल एक ही कक्षा मे पड़े रहेंगे, मेरी भाषा मे 'मोह माया की टट्टी के कीड़े' है ये लोग। ये जनम पर जनम लेते रहेंगे समस्या आए तो पारायण करेंगे और समस्या निवारण हो गई की फैल जाएंगे सुवर के जैसे मोह माया के टट्टी मे। इनकी लाइफ का कोई उद्देश नहीं होता।


दत्तगुरु को लोग कितना गलत समझते हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगा लो, हर साल गुरु चरित्र करते हैं उम्मीद में कि दत्तगुरु दर्शन दे देंगे। अरे exam head कभी सामने आता है? Exam head का काम है syllabus बढ़ाना, कठिनाई बढ़ाना, और तुम्हारी सीमा तोड़कर तुम्हें अगले स्तर पर फेंक देना। दत्तगुरु के दर्शन कोई भक्ति-धारावाहिक का मीठा सीन नहीं। दत्तगुरु के सामने नवनाथ पानी भरते हैं। यह वो शक्ति है जो शिष्य को गोद में नहीं खिलाती—जैसे दादागुरु मत्स्येंद्रनाथ ने अपने शिष्य गोरखनाथ को गोदी में नहीं बिठाया, जंगल में फेंक दिया था, बोले “जा, ये सब कर, फिर मिलना।”

और आज के लोग? दो भजन सुनते हैं “मला हे दत्तगुरु दिसले” बस उसी कल्पना में खो जाते हैं कि दत्तगुरु आएँगे, मुस्कुराएँगे, झप्पी देंगे। झप्पी? परीक्षा देने वाले को झप्पी? दत्तगुरु की मुस्कान भी परीक्षा है, उनकी चुप्पी भी परीक्षा है।

सच ये है कि गुरु जीवन आसान नहीं करेगा। गुरु जीवन को इस तरह उलझाएगा कि तुम अपनी परतें खुद छीलो और अपने असली सार तक पहुँचो। गुरु तुम्हारी इच्छाएँ पूरी नहीं करता गुरु तुम्हें इच्छाओं से मुक्त करता है। और जो गुरु तुम्हारी इच्छा पूरी कर रहा है समझ लो वो तुमको झुनझुना पकड़ा रहा है । गुरु तुम्हें समस्याओं से बचाता नहीं, तुम्हें समस्याओं से लड़ने लायक बनाता है।

जो लोग सोचते हैं कि “गुरु मिल गया = जीवन सेट” उन्हें सबसे कठिन झटका गुरु ही देता है।

क्योंकि गुरु का काम है तुम्हें मंज़िल तक पहुँचाना, न कि तुम्हें अपनी गोदी में पालना। और जो लोग गुरु को पकड़कर बैठ जाते हैं, गुरु उनसे केवल एक चीज़ लेता है—परीक्षा।

Saturday, December 27, 2025

मेरा ध्यान ही नहीं लगता

मेरा ध्यान ही नहीं लगता...मैं पूजा पाठ करने लग जाऊ तो बैठ नहीं पाता...क्यों हो रहा ऐसा...पूजा पाठ करूं तो सब बुरा होने लगता है...
और ये सब सवाल आ जाए दिमाग में तो इनका सॉल्यूशन ढूंढने सोशल मीडिया और गूगल पे पढ़ने लग जाओगे वीडियो देखने लग जाओगे।
और ये सिर्फ पूजा पाठ, अध्यात्म या साधना के क्षेत्र में नहीं हर चीज में है...
शादी नहीं टिक रही, नौकरी में मन नहीं लग रहा, पढ़ाई नहीं हो पा रही, करियर बेकार जा रहा...
क्या किसीने टोना टोटका कर दिया? अजी घंटा...
पूजा पाठ करना है पर क्यों?
ध्यान करना है पर क्यों?
अध्यात्म में सफलता चाहिए पर क्यों?
शादी करनी है पर क्यों?
जॉब करनी है पर क्यों?
करियर करना है पर क्यों?
किसीके देखा देखी या पूरी दुनिया कर रही है या ट्रेंड है इसलिए करोगे तो एक न एक दिन मुंह की खानी ही पड़ेगी...
ये जो छोटासा 'क्यों' है, इसके बहुत मायने है अगर गहन चिंतन करोगे तो क्या कर रहे हो, कैसे कर रहे हो और क्यों कर रहे हो इन सबका जवाब खुद से पूछोगे तो आधी लाइफ के प्रॉब्लम खुद ही सॉल्व हो जायेंगे...
माया उसको छल नहीं सकती जिसका "क्यों" clear है, और उसको छोड़ेगी नहीं जिसके पास इस "क्यों" के हजारों जवाब है।
बाकी तो सब बकवास है।

कलयुग आने वाला है?

कोई सच सुनना नहीं चाहता इसलिए कोई बोलता नहीं सच बोलने वाले को चुप कराया जाता है,
सबको तुरंत चमत्कार चाहिए इसलिए तप किसीको नहीं चाहिए इसलिए ढोंगियों के दरबारो में, मजारों पे भीड़ उमड़ी पड़ी है।
दया की बात करो ही मत सड़क पर चलते किसीका एक्सीडेंट हो जाए तो रील बनाकर डालेंगे पर मदद नहीं करेंगे...,
बचा दान...दान तो सब पुण्य कमाने के लालच में करते है अगर पुण्य ना मिले तो कोई दान भी नहीं करेगा...वरना सोचो जो इंसान कुत्ते बिल्ली गाय मछली सभी प्राणियों को खा सकता है वो केवल ग्रह दशा सुधारने के लिए कुत्ते बिल्ली और मछली को आटे की गोलियां बनाके खिलाता है.....ये तो डर और लालच है दान नहीं।
कलयुग शुरू होके तो सदिया बीत गई है बस मन को सांत्वना दी जाती है कि कलयुग आने वाला है।
कोई अपने मन में झांकने के लिए तैयार नहीं...क्यों की सबको लगता है मैं ही दुखी हूं, सबने मेरा फायदा उठाया, मैं ही पीड़ित हूं, हर कोई दूसरों को दोष दे रहा है, पर ये कोई नहीं सोचता कि जो कुछ हो रहा है वो सब उसके ही भूतकाल में लिए निर्णयों का परिणाम है
सब खुदको सही साबित करने में लगे है...
कल्कि आ नहीं रहा, कल्कि आ चुका है...सब एक घोड़े पर बैठे भगवान जैसी आकृति की प्रतिक्षा कर रहे है जो बड़ी सी तलवार लेके घुमाएगा...
कृष्ण ने कभी अधर्मी यादवों को नहीं मारा क्यों कि उसे पता था ये आपस में ही लड़के मर जाएंगे बचे खुचे अधर्मी प्रकृति के विपदा में साफ होंगे। जो धर्म से चलेंगे वो भी मारे जाएंगे जिनको पुनः जन्म प्राप्त होगा इस सृष्टि के विनाश के पश्चात एक नए पृथ्वी पर एक नए सतयुग में!
इसलिए किसीको सुधारने की कोशिश करने से अच्छा स्वयं धर्म की राह - सत्य, तप, दया, दान पर चलने की शुरुवात करो...क्या पता थोड़ी कम कष्ट दायक मौत मिलेगी...
बाकी तो सबका खीमा तो बनेगा ही चाहे यहां हो या नरक में 😈