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Saturday, March 14, 2026

जमदग्नि उवाच भाग - 4

नीचे लिखी गई बाते पूर्णतः काल्पनिक है (अभी के लिए) 😈

आजकल पूर्ण जगत मे युद्ध की चर्चा है, और सबको चाहिए युद्ध पर विराम लगना चाहिए। एक तरफ आप परिवर्तन भी चाहते हो और दूसरी तरफ विनाश भी नहीं चाहते। पूर्ण विनाश के बिना नवनिर्माण असंभव है। अभी पूरा विश्व संक्रमण काल मे है बदलाव चाहती है सृष्टि, पूर्ण विनाश होकर नया निर्माण होगा। बुरों के साथ अच्छे लोग भी मारे जाएंगे और होना भी चाहिए, युद्ध अच्छे बुरे, बच्चों बूढ़ों मे भेद नहीं करता। दुश्मन की गोली सामने बच्चा बूढ़ा औरत देखके नहीं लगेगी ना बम पूछ के गिरेगा। 



कुछ लोग अबतक बोलते थे कुछ चेंज नहीं होगा और अब होने जा रहा है तो ऐसे लोगोंकी अभी से फटी पड़ी है की अब क्या होगा। अब यही लोग युद्ध को रोकने की बाते करते है। अभी तो शुरू भी नहीं हुआ ठीक से सारे देश बस नेट प्रैक्टिस कर रहे है। फिर भी पैनिक हो रहे। अभी बस टीम बनाई जा रही है की कौन किस टीम मे रहेगा। जिस दिन टीम बन गई उस दिन युध्द शुरू हो जाएगा। और यहा किसी पार्टी या व्यक्ति का कोई जोर नहीं चलेगा। यहा बात आएगी survival की जिसमे दम होगा वो जिएगा फिर चाहे वो पापी हो या फिर पुण्यवान। और हां अध्यात्म भी ऐसा ही निष्ठुर है। यहा ये मायने नहीं रखता की आपने कितने अभिषेक किए शिवजी को, कितनी बार केदारनाथ या अमरनाथ गए। यहा बस मायने रखता है कितना तपोबल है। जैसे इलेक्शन मे मायने नहीं रखता किसने जनता की सेवा की है, मायने ये रखता है किसको वोट ज्यादा आए है। जिसका तपोबल ज्यादा वो जीतेगा ना की भक्ति मे दिनरात दिया जलाने वाला और तीर्थ यात्रा करने वाला। 

मेरा तो युद्ध को पूर्ण समर्थन है, होना भी चाहिए तभी तो कचरा खतम हॉएगा और रंडी रोना करने वाले खतम होंगे। कुछ लोगोंके तो युद्ध शुरू हो गया ये खबर सुनके ही प्राण पखेरू उड़ जाएंगे। 2030 तक युद्ध हो चुका होगा, तबतक काली चलेगी, बगला चलेगी, भैरवी चलेगी, सारे रक्त पिपासु भैरव चलेंगे मसानी, डायने सब मृत देहों पर नाचेंगे, रक्त का पान होगा।  अनेकों युगों की तृष्णा मिटेगी। उसके बाद एक सवेरा आएगा युद्ध समाप्त होगा सब मामला ठंडा हो चुका होगा। और तब शुरू होगा नैसर्गिक आपत्ति का दौर - भूकंप, बाढ़, अकाल, तसुनामी ..  पृथ्वी लंबे अरसे के बाद करवट लेना शुरू करेगी, नैसर्गिक आपदाए शुरू हो जाएंगी। तब फ्यूचर नहीं ना कोई विकास ना कोई पार्टी! बस ये दिमाग मे रहेगा लोगों के की खुदकों जिंदा रखना है किसी भी हाल मे! परिवार नहीं, बीवी बच्चे नहीं, केवल खुद शाम तक जी गए बोहोत है। किसिको retirement की पड़ी नहीं होगी। न जायदाद की पड़ी होगी।

मानसिक और शारीरक रूप से कमजोर लोग युद्ध के बीच मे ही दम तोड़ देंगे। किसी भी हिंदू देवी देवताओं के हाथ मे शस्त्र सिर्फ pose देनेके लिए नहीं होते। सारे भगवान योद्धा ही है चाहे वो देव हो या देवी। अगर आप अध्यात्म मे रहके अहिंसा चाहते हो तो आपको मरना पड़ेगा। क्यों की आप वही deserve करते हो और वैसे भी भेड़ बकरिया बलि देनेके लिए ही होती है। अहिंसा के प्रवचन सुनने को युद्ध के काल मे किसिको टाइम नहीं होगा। पता चला कोई अहिंसा वादी अपना प्रवचन रखा है और दुश्मन देश का बॉम्ब आके हॉल ही उड़ा दिया सभी अहिंसावादी कीड़े एक साथ खतम! मैं तो बोलूँगा ऐसा ही होना चाहिए। रही बात ध्यान धारणा समाधि की तो वो भगवान लोग भी करते है पर युद्ध के टाइम ओन्ली युद्ध...नो बकचोदी प्लीज

युद्ध के काल मे न कोई नियम होगा ना कानून तो सब अपनी अपनी रक्षा का इंतजाम करके रखो। अभी भी एक दो साल का वक्त है राशन पानी से ज्यादा फिकर करो जिंदा रहने की आप राशन पानी जमा करोगे और आपको टपका कर कोई उसको ले जाएगा। जब आप खुदकी ही रक्षा नहीं कर सकते तो जमा किए हुए राशन की कैसे करोगे? इसलिए शस्त्र रखो और उसका प्रयोग भी सिख लो, प्रैक्टिस करो। खुद भी करो घर की बहु बेटियों की भी करने लगाओ। तब आपकी बहु बेटियांने कितने पढ़ाई मार्क्स है, कितने फॉलोवर्स है, कितना कमर मटका सकती है, या कोणसा मस्करा मेकअप मे लगाती है ये नहीं देखा जाएगा। दुश्मन (ये कोई भी हो सकता है मैं कोई विशेष समाज या किसीका विरोध नहीं करता, मैं सारे इंसानी कीड़ों का ही विरोधी हु फिर वो गटर का हो या गंगा का!  bad bacteria हो या दही का good bacteria नियत सबकी खराब होगी क्यों की कलयुग मे किसी भी इंसान मे जमीर नाम की चीज नहीं है) आपके बहु बेटियों पे नजर रखे हुए है की कब युद्ध शुरू हो और मौके मिले। और आप लगे हो राशन जमा करने मे..अच्छा है करो राशन पानी जमा किसी के काम आएगा 😈

तब कोई ये नहीं देखेगा की ये मेरा पड़ोसी है मेरा दोस्त है या कोई रिश्तेदार है, रिश्तेदारी और नाते तबतक है जब तक समाज व्यवस्था है। युद्ध के समय समाजव्यवस्था सबसे पहले टूटती है। और किसिको ये नहीं पड़ी होती की कौन मेरे बारेमे क्या सोचेगा। तब सिर्फ भूक, और जिंदा रहने की तड़प मायने रखेगी। और तब जीने का हकदार वही है जो लड़ेगा।

मेरी बाते काल्पनिक लगेगी पर ये वास्तविकता मे बदलेगी और अवश्य बदलेगी, तब मेरी बात अवश्य मानोगे पर तब समय नहीं होगा और आपके नरक या स्वर्ग सिधारने का समय आ चुका होगा...!

मेरे तरफ से अड्वान्स मे ऐसे अहिंसावादीयो की आत्मा को शांति मिले ॐ  शांति शांति शांति

I believe in War, Not in morality...! 

हर हर महादेव शम्भो शंकरा!

Tuesday, February 24, 2026

जमदग्नि उवाच भाग - 3

 

हर पढ़ा लिखा व्यक्ति सही हो यह भ्रम है, डिग्री नेचर सर्टिफिकेट नहीं होती। कई लोग विश्वविद्यालयों से निकलते हैं, पर भीतर से अभी भी अधूरे, असंतुलित और अहंकारी होते हैं। किताबों ने उन्हें शब्द दिए हैं, पर समझ नहीं। वे तर्क कर सकते हैं, पर सत्य को जी नहीं सकते। उनका आईक्यू ऊँचा हो सकता है, पर जीवन की साधारण परिस्थितियों में उनका धैर्य टूट जाता है। शिक्षित होना और जागरूक होना अलग बातें हैं। आज समाज में सबसे खतरनाक वही है जो आधा जानता है और पूरा समझने का भ्रम पाल लेता है। हर 80 साल का बूढ़ा बुद्धिवान हो जरूरी नहीं भूलो गधे भी बूढ़े होते है। सफेद बाल बुद्धि का प्रमाण नहीं हैं। उम्र केवल शरीर पर चढ़ती है, चेतना पर नहीं। अगर उस बुड्ढे ने जीवन भर अहंकार को पोषित किया है, अपनी गलतियों को ढका है, दूसरों को दोष दिया है, तो वह अस्सी वर्ष की आयु में भी चूतिया है। कई वृद्ध लोग अनुभव का नाम लेकर ego को बचाते हैं। अजी घंटे का अनुभव! वे बदलना नहीं चाहते, सीखना नहीं चाहते, पर सम्मान चाहते हैं। समय ने उन्हें थकाया है, पर तराशा नहीं।

और जो स्वयं को आधुनिक कहते हैं, वे भी सत्य के स्वामी नहीं हैं।
बंदर को कपड़े पहनने का सलीका या जाने से, manners आ जाने से वो Well Educated नहीं हो जाता, हम उसे कहते है 'Well Trained Monkey' Not 'Well Educated Monkey'. अंग्रेज़ी बोल लेना, विज्ञान का नाम ले लेना, परंपरा पर हँस देना, यह बुद्धिमत्ता नहीं है। कई तथाकथित मॉडर्न लोग(well trained monkey's) आध्यात्म को अंधविश्वास कहकर खारिज कर देते हैं, जबकि उन्होंने न आत्मा को समझा है, न विज्ञान को।

वे Labs की बात करते हैं, पर अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं रखते। वे तर्क के नाम पर संवेदनहीन हो चुके हैं। उन्हें लगता है कि जो दिखाई नहीं देता वह अस्तित्व में नहीं है। यह अज्ञान का आधुनिक रूप है। 
सच यह है कि मनुष्य का मूल्य उसकी डिग्री से तय नहीं होता, न उसकी उम्र से, न उसकी आधुनिकता से। यदि उसके भीतर नैतिकता नहीं, करुणा नहीं, संतुलन नहीं, आत्मचिंतन नहीं, तो वह चाहे जितना पढ़ा लिखा हो, चाहे जितना बूढ़ा हो, चाहे जितना प्रगतिशील दिखे, भीतर से खोखला है। उच्च आईक्यू अहंकार को बढ़ा सकता है। बिना भावनात्मक परिपक्वता के बुद्धि विनाशकारी हो सकती है। बिना आध्यात्मिक आधार के आधुनिकता दिशाहीन हो जाती है।

पूर्णता शब्दों से नहीं आती, संतुलन से आती है। बुद्धि हो पर करुणा भी हो। तर्क हो पर विनम्रता भी हो। शक्ति हो पर संयम भी हो। जो इन गुणों को साधने का प्रयास नहीं करता, वह केवल दिखावे का मनुष्य है। कड़वा सत्य यही है कि आज समाज में पढ़े लिखे लोग अधिक हैं, पर जागे हुए लोग बहुत कम हैं।

घोड़े और गधे का भी यही सिद्धांत है। घोड़ा तेज है, आकर्षक है, रणभूमि में दौड़ सकता है। उसमें गति है, ऊर्जा है, प्रभाव है। लेकिन क्या वह दिन भर बोझ उठाकर पथरीले रास्तों पर चल सकता है। हर शक्ति का अपना क्षेत्र होता है। गधा धीमा है, साधारण दिखता है, परंतु सहनशक्ति रखता है। वह बिना शोर किए भार उठाता है, लगातार चलता है, थकान सहता है। जो केवल गति को श्रेष्ठ मानेगा, वह सहनशीलता का मूल्य नहीं समझ पाएगा।

इंसानी कीड़ों में भी यही विविध आयाम होते हैं। केवल सोचने और समझने की क्षमता अर्थात आईक्यू पर्याप्त नहीं है। IQ बुद्धि देता है, पर दिशा नहीं देता। EQ अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने की शक्ति देता है, जिससे संबंध टिकते हैं। SQ समाज के साथ संवेदनशील संपर्क सिखाता है। CQ क्रिएटिविटी नए दृष्टिकोण से देखने की कला देती है, जिससे नवाचार जन्म लेता है। AQ  संकट में टूटने के बजाय और मजबूत बनना सिखाता है। MQ सही और गलत का स्पष्ट विवेक देता है। SLQ जीवन के अंतिम सत्य को जानने की प्यास जगाता है।

यदि इन सबमें Balance न हो, तो मनुष्य एकांगी हो जाता है। केवल बुद्धि हो और करुणा न हो तो कठोरता पैदा होती है। केवल भावनाएं हों और विवेक न हो तो भ्रम पैदा होता है। केवल सामाजिक कौशल हो और नैतिकता न हो तो चालाकी जन्म लेती है। केवल आध्यात्मिक भाषा हो और आचरण न हो तो पाखंड खड़ा होता है। भारतीय आदर्शों में ऐसे संतुलन का वर्णन दो महापुरुषों में मिलता है। Rama में नैतिकता, मर्यादा, धैर्य और कर्तव्य का उच्च शिखर दिखाई देता है। Krishna में बुद्धिमत्ता, रणनीति, भावनाओं की गहराई, सामाजिक कुशलता और आध्यात्मिक ज्ञान का अद्वितीय संगम दिखता है। एक में मर्यादा की दृढ़ता है, दूसरे में जीवन की लचीली समझ।

यह कहना कि केवल IQ ही सब कुछ है, वैसा ही है जैसे कहना कि केवल ताकत ही पर्याप्त है। जीवन में बल के साथ विवेक चाहिए, विवेक के साथ करुणा चाहिए, करुणा के साथ साहस चाहिए, और साहस के साथ आत्मज्ञान चाहिए। मनुष्य एक music instrument की तरह है। यदि केवल एक string कसकर रखा जाए और बाकी ढीले हों, तो संगीत नहीं निकलेगा। जब सभी तार संतुलित अनुपात में हों, तभी मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है।

इसी संतुलन का नाम संपूर्णता है।

Saturday, February 21, 2026

जमदग्नि उवाच भाग - 2

आध्यात्मिक मार्ग फूलों की सेज नहीं है। यह युद्धभूमि है। और इस युद्ध में सबसे खतरनाक बात यह है कि शत्रु सामने खड़ा दिखाई नहीं देता। वह आपके भीतर बैठा होता है, आपके विचारों में, आपकी इच्छाओं में, आपकी साधना में। अज्ञान की माया में ज्ञानी भी फँसते हैं। जो सोचता है कि अब मैं समझ गया, वही सबसे अधिक भ्रम में है।

साधना का प्रारंभ सरल लगता है। थोड़ी शांति मिली, थोड़ा ध्यान गहरा हुआ, कुछ सूक्ष्म अनुभव हुए और मन ने घोषणा कर दी कि अब तुम विशेष हो। यहीं से पतन का बीज बोया जाता है। सिद्धि और शक्तियों की प्राप्ति होना अंतिम लक्ष्य नहीं है। पर साधक वहीं रुक जाता है। उसे लगता है कि उसने कुछ पा लिया। वह अनुभवों को पकड़कर बैठ जाता है। यही माया है। यह वही जाल है जिसे बड़े बड़े ज्ञानी भी भेद नहीं पाते। क्योंकि यह जाल लोहे का नहीं, अहंकार का होता है। जब साधना में कुछ शक्ति आती है तो व्यक्ति को प्रतीत होता है कि वह दूसरों से अलग है। वह लोगों को देखने लगता है जैसे वे सामान्य हैं और वह असामान्य। यह विभाजन ही पतन की शुरुआत है। आध्यात्मिक मार्ग पर सबसे बड़ा खतरा पाप नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अहंकार है। पाप आपको गिराता है तो आप समझ जाते हैं कि आप गिरे हैं। पर जब अहंकार आपको उठाकर खड़ा करता है और कहता है कि तुम ऊँचे हो, तब आप गिरते हुए भी स्वयं को चढ़ता हुआ समझते हैं।

यहाँ शत्रु एक नहीं है। यहाँ तुम्हारा मन भी तुम्हारा शत्रु है। मन ही कल्पना करता है, मन ही अनुभवों को सजाता है, मन ही तुम्हें विशेष घोषित करता है। माया भी शत्रु है, क्योंकि वह सत्य को ढँकती नहीं, उसे सुंदर रूप देकर प्रस्तुत करती है। नकारात्मक शक्तियाँ भी शत्रु हैं, क्योंकि वे तुम्हारी दुर्बलताओं को पहचानती हैं और वहीं प्रहार करती हैं जहाँ तुम स्वयं को सबसे अधिक मजबूत समझते हो। भौतिक जगत और जगत के सभी लोग भी शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं। हर कोई तुम्हारी परीक्षा है। कोई तुम्हें अपमान देकर देखेगा कि तुम्हारा अहंकार कितना जीवित है। कोई तुम्हारी प्रशंसा करेगा और देखेगा कि तुम भीतर से कितने स्थिर हो। कोई तुम्हें ठुकराएगा, कोई तुम्हें स्वीकार करेगा। हर परिस्थिति तुम्हारे भीतर छिपे विकार को बाहर निकालने का माध्यम है।

और जैसे जैसे तुम साधना के स्तर पार करते जाते हो, एक और विचित्र सत्य सामने आता है। गुरु भी शत्रु जैसे प्रतीत होने लगते हैं। क्योंकि गुरु तुम्हें आराम देने के लिए नहीं होते। वे तुम्हारी परीक्षा का स्तर बढ़ाते जाते हैं। जब तुम भौतिक स्तर से सूक्ष्म स्तर में प्रवेश करते हो, तब परीक्षाएँ भी पारलौकिक हो जाती हैं। भीतर भय उठता है, संशय उठता है, अस्तित्व हिलता है। तुम्हें लगता है कि गुरु कठोर हो गए हैं। तुम्हें लगता है कि वे तुम्हें समझ नहीं रहे। पर वास्तव में वे तुम्हें तोड़ रहे होते हैं ताकि तुम्हारी झूठी पहचान गिर सके। साधना में एक क्षण ऐसा आता है जब व्यक्ति give up करने की सोचता है। उसे लगता है कि अब बहुत हो गया। अब और नहीं सह सकता। उस क्षण यदि वह छोड़ देता है तो बाहर से देखने वालों को लगेगा कि उसने स्वयं को बचा लिया। पर सत्य यह है कि वह उसी स्थान पर असफल हो गया जहाँ उसे पार जाना था। आध्यात्मिक मार्ग में give up करना पास होना नहीं है। वह परीक्षा में उत्तरपुस्तिका खाली छोड़ देने जैसा है। गुरु संभाल लेंगे, यह सोचकर पीछे हट जाना आत्मसमर्पण नहीं, पलायन है।

सच्चा समर्पण वह है जहाँ तुम टूटते हुए भी टिके रहते हो। जहाँ तुम्हें लगता है कि सब कुछ छिन रहा है, फिर भी तुम साधना नहीं छोड़ते। जहाँ अनुभव शून्य हो जाते हैं, शक्तियाँ मौन हो जाती हैं, और भीतर केवल अंधकार बचता है, फिर भी तुम भागते नहीं। क्योंकि उस अंधकार के पार ही वास्तविक प्रकाश है। जो साधक सिद्धियों में उलझ गया, वह वहीं रुक गया। जो शक्तियों में आनंद लेने लगा, वह वहीं ठहर गया। जो स्वयं को जागृत घोषित कर बैठा, वह वहीं सो गया। आध्यात्मिक मार्ग पर आगे वही बढ़ता है जो हर उपलब्धि को त्याग सके। जो हर अनुभव को आने दे और जाने दे। जो स्वयं को कुछ भी न माने।

यह मार्ग अकेले चलने का भ्रम देता है, पर वास्तव में अकेले चलना संभव नहीं। गुरु का होना अनिवार्य है। पर गुरु भी तुम्हें सिर पर हाथ रखकर नहीं चलाते। वे तुम्हें धक्का देते हैं। वे तुम्हें गिरते देखते हैं। वे तुम्हें उठने का अवसर देते हैं, पर तुम्हारे स्थान पर चल नहीं सकते। इस युद्ध में बाहरी शत्रु से अधिक खतरनाक भीतर का शत्रु है। मन, माया, अहंकार, भय, सिद्धियाँ, शक्तियाँ, प्रशंसा, अपमान, यहाँ तक कि गुरु की कठोरता भी। हर स्तर पर परीक्षा है। हर स्तर पर भ्रम है।

जो इस मार्ग पर चलना चाहता है उसे यह स्वीकार करना होगा कि यहाँ कोई सुरक्षित क्षेत्र नहीं है। यहाँ हर क्षण सजग रहना होगा। यहाँ हर उपलब्धि पर संदेह करना होगा। यहाँ हर अनुभव को अंतिम मानने की भूल नहीं करनी होगी।

अज्ञान में फँसना सरल है। ज्ञान में फँसना और भी सरल है। पर ज्ञान के पार जाना कठिन है। वही वास्तविक साधना है। वही वास्तविक युद्ध है। और वही वास्तविक जागरण है।

Saturday, December 27, 2025

मेरा ध्यान ही नहीं लगता

मेरा ध्यान ही नहीं लगता...मैं पूजा पाठ करने लग जाऊ तो बैठ नहीं पाता...क्यों हो रहा ऐसा...पूजा पाठ करूं तो सब बुरा होने लगता है...
और ये सब सवाल आ जाए दिमाग में तो इनका सॉल्यूशन ढूंढने सोशल मीडिया और गूगल पे पढ़ने लग जाओगे वीडियो देखने लग जाओगे।
और ये सिर्फ पूजा पाठ, अध्यात्म या साधना के क्षेत्र में नहीं हर चीज में है...
शादी नहीं टिक रही, नौकरी में मन नहीं लग रहा, पढ़ाई नहीं हो पा रही, करियर बेकार जा रहा...
क्या किसीने टोना टोटका कर दिया? अजी घंटा...
पूजा पाठ करना है पर क्यों?
ध्यान करना है पर क्यों?
अध्यात्म में सफलता चाहिए पर क्यों?
शादी करनी है पर क्यों?
जॉब करनी है पर क्यों?
करियर करना है पर क्यों?
किसीके देखा देखी या पूरी दुनिया कर रही है या ट्रेंड है इसलिए करोगे तो एक न एक दिन मुंह की खानी ही पड़ेगी...
ये जो छोटासा 'क्यों' है, इसके बहुत मायने है अगर गहन चिंतन करोगे तो क्या कर रहे हो, कैसे कर रहे हो और क्यों कर रहे हो इन सबका जवाब खुद से पूछोगे तो आधी लाइफ के प्रॉब्लम खुद ही सॉल्व हो जायेंगे...
माया उसको छल नहीं सकती जिसका "क्यों" clear है, और उसको छोड़ेगी नहीं जिसके पास इस "क्यों" के हजारों जवाब है।
बाकी तो सब बकवास है।

कलयुग आने वाला है?

कोई सच सुनना नहीं चाहता इसलिए कोई बोलता नहीं सच बोलने वाले को चुप कराया जाता है,
सबको तुरंत चमत्कार चाहिए इसलिए तप किसीको नहीं चाहिए इसलिए ढोंगियों के दरबारो में, मजारों पे भीड़ उमड़ी पड़ी है।
दया की बात करो ही मत सड़क पर चलते किसीका एक्सीडेंट हो जाए तो रील बनाकर डालेंगे पर मदद नहीं करेंगे...,
बचा दान...दान तो सब पुण्य कमाने के लालच में करते है अगर पुण्य ना मिले तो कोई दान भी नहीं करेगा...वरना सोचो जो इंसान कुत्ते बिल्ली गाय मछली सभी प्राणियों को खा सकता है वो केवल ग्रह दशा सुधारने के लिए कुत्ते बिल्ली और मछली को आटे की गोलियां बनाके खिलाता है.....ये तो डर और लालच है दान नहीं।
कलयुग शुरू होके तो सदिया बीत गई है बस मन को सांत्वना दी जाती है कि कलयुग आने वाला है।
कोई अपने मन में झांकने के लिए तैयार नहीं...क्यों की सबको लगता है मैं ही दुखी हूं, सबने मेरा फायदा उठाया, मैं ही पीड़ित हूं, हर कोई दूसरों को दोष दे रहा है, पर ये कोई नहीं सोचता कि जो कुछ हो रहा है वो सब उसके ही भूतकाल में लिए निर्णयों का परिणाम है
सब खुदको सही साबित करने में लगे है...
कल्कि आ नहीं रहा, कल्कि आ चुका है...सब एक घोड़े पर बैठे भगवान जैसी आकृति की प्रतिक्षा कर रहे है जो बड़ी सी तलवार लेके घुमाएगा...
कृष्ण ने कभी अधर्मी यादवों को नहीं मारा क्यों कि उसे पता था ये आपस में ही लड़के मर जाएंगे बचे खुचे अधर्मी प्रकृति के विपदा में साफ होंगे। जो धर्म से चलेंगे वो भी मारे जाएंगे जिनको पुनः जन्म प्राप्त होगा इस सृष्टि के विनाश के पश्चात एक नए पृथ्वी पर एक नए सतयुग में!
इसलिए किसीको सुधारने की कोशिश करने से अच्छा स्वयं धर्म की राह - सत्य, तप, दया, दान पर चलने की शुरुवात करो...क्या पता थोड़ी कम कष्ट दायक मौत मिलेगी...
बाकी तो सबका खीमा तो बनेगा ही चाहे यहां हो या नरक में 😈

Monday, October 13, 2025

जमदग्नि उवाच - भाग एक

जीवन का सबसे बड़ा युद्ध किसी दुश्मन से नहीं, अपने ही भीतर के दानवों से होता है। जो इस बात को नहीं समझता, वह जन्म-जन्मांतर तक हारता रहेगा। हर इंसान के भीतर एक अर्जुन है जो भागना चाहता है, और एक कृष्ण है जो कहता है  “लड़ जा और फाड़ दे” जो सुख चाहता है, वो पहले ही गिर चुका है। सुख, मोह, प्रेम, स्वाद, नाम, आस and all ये बस जंजीरें हैं जो आत्मा को बांध देती हैं। दुनिया कहती है प्रेम में जीवन है, पर सच्चाई ये है कि प्रेम में बंधन है। विरक्ति ही असली स्वतंत्रता है। जो कुछ भी जैसा है, उसे वैसा ही रहने दो। दुनिया को बदलने की बीमारी छोड़ देना ही होशियारी है, खुद को बदलना पड़ता है। बाहर कुछ गलत नहीं, गड़बड़ तेरे भीतर है। जो हर बात पर दुखी होता है, उसे समझना चाहिए कि वह भावनाओं का गुलाम है। साधक वही है जो अपने मन को आदेश दे, ना कि मन से आदेश ले।

अहंकार हर युद्ध की जड़ है। जब तक “मैं” बड़ा हूँ, तब तक दुनिया का हर सच छोटा है। अर्जुन तब तक कुछ नहीं समझ पाया जब तक उसने खुदकों नहीं झुकाया, जब तक उसने “मैं” नहीं छोड़ा। और वही क्षण आत्मा के जागरण का होता है जब इंसान कहता है “जो होना है, अब बस हो जाए।” जब तू वास्तविकता को उसी रूप में स्वीकार लेता है, तब तू ईश्वर के साथ बहना शुरू करता है, लड़ना बंद कर देता है। ईर्ष्या, शिकायत, पछतावा ये सब उस इंसानी कीड़े के लक्षण हैं जिसने खुद को नहीं जाना। जो सच्चा साधक है, वो किसी से कोई compare नहीं करता। जिसने खुद को जान लिया, उसे किसी से जलन नहीं हो सकती। वह जानता है कि हर आत्मा का मार्ग अलग है। जो दूसरों के सुख पर कुंठित है, वह खुद के दुख का निर्माता है।

मृत्यु को देखकर भागने वाले असंख्य हैं, पर उसे देखकर मुस्कुराने वाले बोहोत कम हैं। जो मरने से डरता है, वह जीने के लायक नहीं। भीष्म के जैसा मरने की कला सिखनी है जब चाहो, जब ठानो, तब प्राण छोड़ दो, क्योंकि तब मृत्यु अपने अधीन हो जाती है। मृत्यु तब तक डराती है जब तक तू खुद को शरीर समझता है। जिस दिन तू समझ गया कि तू बॉडी नहीं, चेतना है, उस दिन मृत्यु भी तुझे प्रणाम करती है। पैसा, इज्जत, सुरक्षा ये सब धोखे हैं। जितना तू भविष्य के लिए जोड़ता है, उतना तू वर्तमान से कटता जाता है। जो साधक अपने कल के भय में जीता है, वह आज की ज़िंदगी खो देता है। जीवन का एक ही मंत्र है जो चाहिए नहीं, उसे छोड़ देना है। हर वस्तु, हर संबंध, हर आदत जो तुझे बोझ लगती है, उसे काट फेंक। मुक्त होना सजावट से नहीं, त्याग से होता है।

देवताओं का सम्मान कर, पर उनसे भीख मत माँग। ईश्वर भिखारियों का साथी नहीं, योद्धाओं का साक्षी है। जो कर्म नहीं करता, जो सिर्फ प्रार्थना में डूबा रहता है, वह खुदकों को धोखा दे रहा है। ईश्वर तुझे नहीं चलाएगा, तू खुद उठेगा तो ईश्वर तेरे पीछे खड़ा होगा। यही साक्षीभाव है। प्रेम, वासना, और भावना ये तीन रस सबसे मीठे ज़हर हैं। जो इनसे ऊपर उठ गया, वही योगी है। जो प्रेम को अधिकार समझता है, वह पथभ्रष्ट है। जो वासना को प्रेम समझता है, वह पशु है। जो इन सबको देखता है पर बंधता नहीं, वही ईश्वर का दूत है। स्थान का कोई अर्थ नहीं, स्थिति का अर्थ है। चाहे तू राजमहल में बैठा हो या गुफा में, अगर मन स्थिर है, तो वही तीर्थ है। अगर मन अस्थिर है, तो स्वर्ग भी नरक बन जाता है। साधना का कोई भूगोल नहीं, केवल मन का संतुलन है।

सम्मान को हमेशा देह से ऊपर रखो। शरीर मिट्टी है, पर गरिमा अमर है। जिसने अपने सत्य से समझौता किया, वह चाहे जितना जिए, मरा हुआ है। जो अपने पथ से नहीं डिगा, वही जीवित है। जीवन का मूल्य सांसों से नहीं, संकल्प से मापा जाता है। धर्म का अर्थ पूजा नहीं, अपने मार्ग पर अडिग रहना है। अर्जुन ने युद्ध किया, राम ने वनवास जिया, कृष्ण रण में मुस्कुराया तीनों का सत्य एक ही था: जो अपने धर्म से नहीं हटा, वही मुक्त हुआ। यही योग है, यही ध्यान है, यही ब्रह्म है।

दुनिया तुझे हर क्षण गिराने की कोशिश करेगी। लोग कहेंगे भावनात्मक बन, प्रेम कर, संवेदनशील बन पर सच्चाई यह है कि जितना तू संवेदनशील होगा, उतना कमजोर होगा। अध्यात्म का मार्ग लोहे जैसा कठोर है। यहाँ करुणा नहीं, यहाँ स्पष्टता चाहिए। यहाँ भावना नहीं, यहाँ साक्षी चाहिए। विरक्ति का अर्थ भागना नहीं है, समझना है। जब तू देख लेता है कि हर चीज़ अस्थायी है, तो मोह अपने आप गिर जाता है। जो संसार को गंभीरता से लेता है, उसने अभी कुछ नहीं समझा। जीवन खेल है, पर जो इसे असली समझता है, वही हारता है। हर दिन अपने भीतर के युद्ध को देख कब मन डरता है, कब ईर्ष्या करता है, कब बहकता है। वही तेरा कुरुक्षेत्र है। वहाँ कृष्ण भी तू ही है, अर्जुन भी तू ही है। जब तू खुद अपने भीतर के युद्ध में विजयी होगा, तभी बाहर की दुनिया झुक जाएगी।

साधक वही है जो अकेला चलता है, न प्रशंसा की चाह में, न संग की लालसा में। एकांत में जो अडिग है, वही आदिशिव से जुड़ा है। जो भीड़ में मजबूत दिखता है, वह भीतर से टूटा हुआ है। अकेला होना एक तप है। मौन रहना एक युद्ध है। विरक्ति एक विजय है। जीवन का रहस्य यही है कुछ मत पकड़, कुछ मत मांग, किसीसे मत डर कोई माई का लाल नहीं जो तेरा बाल भी बांका कर सके। बस देखते रह, ज्वालामुखी जैसा जलते रह और आगे बढ़ते रह। और जब मौत सामने आए, तो उसी शांति से देखो जैसे उगते सूरज को देख रहा है। क्योंकि जिसने जीवन को साक्षीभाव से देखा, उसके लिए मृत्यु भी बस एक और परिवर्तन है।

शिवांश (हर्यक्ष) जमदग्नि