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Wednesday, February 18, 2026

शव से शिव तक - भाग एक

कलयुग में आध्यात्मिकता कोई मीठी कहानी नहीं है यह सीधा टकराव है और जो भी साधना के नाम पर सच में खड़ा होता है उसे सबसे पहले अपने ही लोगों से चोट मिलती है क्योंकि दुनिया को सोए हुए लोग पसंद हैं जागे हुए नहीं. तुम अगर चुपचाप अपनी नौकरी करो पैसा कमाओ परिवार पालो और सिस्टम के हिसाब से सिर झुकाकर चलो तो कोई समस्या नहीं होगी लेकिन जैसे ही तुमने अंधविश्वास को चुनौती दी ढोंग को बेनकाब किया भीड़ की मानसिक गुलामी पर सवाल उठाया वैसे ही तुम खतरा घोषित कर दिए जाओगे. यह रास्ता लाइक और फॉलोवर का नहीं है यह रास्ता अकेलेपन का है यहाँ ताली नहीं पड़ती यहाँ पीठ पीछे वार होता है यहाँ चरित्र पर कीचड़ उछाला जाता है यहाँ तुम्हारी नीयत को नापा जाता है जैसे तुम कोई अपराधी हो. आज बाजार में आध्यात्मिकता बिक रही है पैकेज में शांति मिल रही है कोर्स में जागरण मिल रहा है और विज्ञापन में मोक्ष मिल रहा है लेकिन जो सच में साधना करता है वह जानता है कि यह सब दिखावा है क्योंकि साधना का मतलब है खुद को काटना खुद को तोड़ना खुद की पोल खोलना. साधना का मतलब है अपने भीतर का लालच देखना अपनी कामना देखना अपना डर देखना और यह मानना कि अभी तुम पवित्र नहीं हो अभी तुम भीड़ जैसे ही हो और यही स्वीकार करना पहला वार है अपने अहंकार पर.

हर कोई शिव बनने की बात करता है लेकिन शव बनने को कोई तैयार नहीं क्योंकि शव बनना मतलब अहंकार का अंत और यह सबसे कठिन है जब तक तुम्हें सम्मान चाहिए जब तक तुम्हें मान्यता चाहिए जब तक तुम्हें यह सुनना अच्छा लगता है कि तुम महान हो तब तक तुम साधक नहीं अभिनेता हो. शिवत्व कोई आभूषण नहीं है यह अवस्था है और इस अवस्था तक पहुँचने के लिए पहले अपने भीतर की गंदगी से गुजरना पड़ता है अपनी सुविधा को जलाना पड़ता है अपनी सुरक्षा को छोड़ना पड़ता है क्योंकि साधना आराम से नहीं होती साधना आग में होती है. तुम्हें मानसिक दबाव झेलना पड़ेगा लोग तुम्हें पागल कहेंगे तुम्हें असफल कहेंगे तुम्हें स्वार्थी कहेंगे और कई बार तुम्हारा मन भी तुम्हें धोखा देगा लेकिन अगर संकल्प बड़ा है तो तुम्हें खड़ा रहना होगा चाहे पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ क्यों न हो जाए. शारीरिक थकान आएगी नींद टूटेगी शरीर जवाब देगा लेकिन साधना शरीर की गुलामी नहीं है यह शरीर को साधन बनाने की प्रक्रिया है और जो इस प्रक्रिया से भागता है वह केवल शब्दों में आध्यात्मिक रहता है जीवन में नहीं. 

साफ नियम है या तो सुविधा चुनो या सत्य चुनो दोनों साथ नहीं मिलते और जो सत्य चुनता है उसे कीमत चुकानी ही पड़ती है क्योंकि सत्य भीड़ को असहज करता है.

कलयुग मे साधक के प्राण हर पल संकट मे होते है उसे मानसिक, भौतिक, शारीरिक तथा पारलौकिक पीड़ाओ को सहना ही पड़ता है, परंतु निर्णय जब निस्वार्थ होता है केवल खुदके और परिवार के सुखों तक सीमित नहीं होता तब उद्देश्य उत्तम होता है। संकल्प जब समाज का कल्याण करने का होता है तब शव समान मनुष्य के अंदर सुप्त पड़ा शिव का तत्व बाहर जरूर आता है। शव से शिव बनने के लिए मानसिक, भौतिक, शारीरिक हर परिस्थिति मे खुदकी चिता जलानी ही पड़ेगी तब बाहर आता है शिव का अंश..जिसका ना कोई आदि है ना कोई अंत!

To Be Continue...!