
हर पढ़ा लिखा व्यक्ति सही हो यह भ्रम है, डिग्री नेचर सर्टिफिकेट नहीं होती। कई लोग विश्वविद्यालयों से निकलते हैं, पर भीतर से अभी भी अधूरे, असंतुलित और अहंकारी होते हैं। किताबों ने उन्हें शब्द दिए हैं, पर समझ नहीं। वे तर्क कर सकते हैं, पर सत्य को जी नहीं सकते। उनका आईक्यू ऊँचा हो सकता है, पर जीवन की साधारण परिस्थितियों में उनका धैर्य टूट जाता है। शिक्षित होना और जागरूक होना अलग बातें हैं। आज समाज में सबसे खतरनाक वही है जो आधा जानता है और पूरा समझने का भ्रम पाल लेता है। हर 80 साल का बूढ़ा बुद्धिवान हो जरूरी नहीं भूलो गधे भी बूढ़े होते है। सफेद बाल बुद्धि का प्रमाण नहीं हैं। उम्र केवल शरीर पर चढ़ती है, चेतना पर नहीं। अगर उस बुड्ढे ने जीवन भर अहंकार को पोषित किया है, अपनी गलतियों को ढका है, दूसरों को दोष दिया है, तो वह अस्सी वर्ष की आयु में भी चूतिया है। कई वृद्ध लोग अनुभव का नाम लेकर ego को बचाते हैं। अजी घंटे का अनुभव! वे बदलना नहीं चाहते, सीखना नहीं चाहते, पर सम्मान चाहते हैं। समय ने उन्हें थकाया है, पर तराशा नहीं।
और जो स्वयं को आधुनिक कहते हैं, वे भी सत्य के स्वामी नहीं हैं।
बंदर को कपड़े पहनने का सलीका या जाने से, manners आ जाने से वो Well Educated नहीं हो जाता, हम उसे कहते है 'Well Trained Monkey' Not 'Well Educated Monkey'. अंग्रेज़ी बोल लेना, विज्ञान का नाम ले लेना, परंपरा पर हँस देना, यह बुद्धिमत्ता नहीं है। कई तथाकथित मॉडर्न लोग(well trained monkey's) आध्यात्म को अंधविश्वास कहकर खारिज कर देते हैं, जबकि उन्होंने न आत्मा को समझा है, न विज्ञान को।
वे Labs की बात करते हैं, पर अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं रखते। वे तर्क के नाम पर संवेदनहीन हो चुके हैं। उन्हें लगता है कि जो दिखाई नहीं देता वह अस्तित्व में नहीं है। यह अज्ञान का आधुनिक रूप है। सच यह है कि मनुष्य का मूल्य उसकी डिग्री से तय नहीं होता, न उसकी उम्र से, न उसकी आधुनिकता से। यदि उसके भीतर नैतिकता नहीं, करुणा नहीं, संतुलन नहीं, आत्मचिंतन नहीं, तो वह चाहे जितना पढ़ा लिखा हो, चाहे जितना बूढ़ा हो, चाहे जितना प्रगतिशील दिखे, भीतर से खोखला है। उच्च आईक्यू अहंकार को बढ़ा सकता है। बिना भावनात्मक परिपक्वता के बुद्धि विनाशकारी हो सकती है। बिना आध्यात्मिक आधार के आधुनिकता दिशाहीन हो जाती है।
पूर्णता शब्दों से नहीं आती, संतुलन से आती है। बुद्धि हो पर करुणा भी हो। तर्क हो पर विनम्रता भी हो। शक्ति हो पर संयम भी हो। जो इन गुणों को साधने का प्रयास नहीं करता, वह केवल दिखावे का मनुष्य है। कड़वा सत्य यही है कि आज समाज में पढ़े लिखे लोग अधिक हैं, पर जागे हुए लोग बहुत कम हैं।
घोड़े और गधे का भी यही सिद्धांत है। घोड़ा तेज है, आकर्षक है, रणभूमि में दौड़ सकता है। उसमें गति है, ऊर्जा है, प्रभाव है। लेकिन क्या वह दिन भर बोझ उठाकर पथरीले रास्तों पर चल सकता है। हर शक्ति का अपना क्षेत्र होता है। गधा धीमा है, साधारण दिखता है, परंतु सहनशक्ति रखता है। वह बिना शोर किए भार उठाता है, लगातार चलता है, थकान सहता है। जो केवल गति को श्रेष्ठ मानेगा, वह सहनशीलता का मूल्य नहीं समझ पाएगा।
इंसानी कीड़ों में भी यही विविध आयाम होते हैं। केवल सोचने और समझने की क्षमता अर्थात आईक्यू पर्याप्त नहीं है। IQ बुद्धि देता है, पर दिशा नहीं देता। EQ अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने की शक्ति देता है, जिससे संबंध टिकते हैं। SQ समाज के साथ संवेदनशील संपर्क सिखाता है। CQ क्रिएटिविटी नए दृष्टिकोण से देखने की कला देती है, जिससे नवाचार जन्म लेता है। AQ संकट में टूटने के बजाय और मजबूत बनना सिखाता है। MQ सही और गलत का स्पष्ट विवेक देता है। SLQ जीवन के अंतिम सत्य को जानने की प्यास जगाता है।
यदि इन सबमें Balance न हो, तो मनुष्य एकांगी हो जाता है। केवल बुद्धि हो और करुणा न हो तो कठोरता पैदा होती है। केवल भावनाएं हों और विवेक न हो तो भ्रम पैदा होता है। केवल सामाजिक कौशल हो और नैतिकता न हो तो चालाकी जन्म लेती है। केवल आध्यात्मिक भाषा हो और आचरण न हो तो पाखंड खड़ा होता है। भारतीय आदर्शों में ऐसे संतुलन का वर्णन दो महापुरुषों में मिलता है। Rama में नैतिकता, मर्यादा, धैर्य और कर्तव्य का उच्च शिखर दिखाई देता है। Krishna में बुद्धिमत्ता, रणनीति, भावनाओं की गहराई, सामाजिक कुशलता और आध्यात्मिक ज्ञान का अद्वितीय संगम दिखता है। एक में मर्यादा की दृढ़ता है, दूसरे में जीवन की लचीली समझ।
यह कहना कि केवल IQ ही सब कुछ है, वैसा ही है जैसे कहना कि केवल ताकत ही पर्याप्त है। जीवन में बल के साथ विवेक चाहिए, विवेक के साथ करुणा चाहिए, करुणा के साथ साहस चाहिए, और साहस के साथ आत्मज्ञान चाहिए। मनुष्य एक music instrument की तरह है। यदि केवल एक string कसकर रखा जाए और बाकी ढीले हों, तो संगीत नहीं निकलेगा। जब सभी तार संतुलित अनुपात में हों, तभी मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है।
इसी संतुलन का नाम संपूर्णता है।